प्रसिद्ध दार्शनिक एवं कूटनीतिक आचार्य कौटिल्य ने अपने ग्रंथ “अर्थशास्त्र” में युद्ध दर्शन एवं मौर्यकालीन सैन्य पद्धति का सूक्ष्म एवं महानतम विश्लेषण प्रस्तुत किया है उसमें कौटिल्य ने सैन्य दुर्ग, युद्धकला, दूत एवं गुप्तचर व्यवस्था के साथ ही अंतराजयिय सम्बंध और कूटनीति का वर्णन किया है।

कोई भी छेत्र आचार्य कौटिल्य से अछूता नही रहा है। कौटिल्य की विलिक्षण प्रतिभा ही थी की उनका प्रव्हाव 20 सदी के महान सैन्य नीति निर्माताओं पर भी दिखाई देता है इनकी नीति में स्टालिन पर प्रजातंत्र, चर्चिल पर साम्राज्य बाद, हिट्लर पर कुशलता, विल्सन पर आदर्शवाद तथा चाग पर देशभक्ति के लक्षण एक साथ दिखाई पड़ते है। कौटिल्य के अपने युद्ध दर्शन में चतुरन बाल की प्रधानता होते हुए भी सहायक बलों के रूप में चार अन्य बलों का उल्लेख किया था। कौटिल्य ने छेत्रिया वर्ग को सेना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना लेकिन आवश्यकता को देखते हुए वीर पुरूषों से युक्त वैश्या या शूद्र की सेना में भर्ती को उत्तम माना इस काल में सैनिकों के वेतन की समुचित व्यवस्था थी। कौटिल्य ने सेनानायकों, सैनिकों के प्रशिक्षण के साथ ही अश्वों एवं हाथियों को भी प्रशिक्षण देने की बात कही।